Delhi Metro is unsafe and unviable

The Delhi Metro which is winning accolades all over costs close to Rs.200 crores per KM compared to a Skybus which is 100% indegenous and costs only Rs.50 crores per km
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4 comments:

  1. Delhi Metro is bleeding the nation. When there is a precertified Metro such as Skybus, why should the Government borrow from a 3rd country against Government Guarantees. No sensible person would think of committing such mistakes and it is all being done out of vested interests. When a Skybus can be constructed at a much lesses cost in which the Govt does not need to give any gap funding then why???? It is a shame that even in todays generation another Amar Bose of Bose Corporation is being replicated
    http://mboard.rediff.com/newboard/permapost/s/bmoney2006apr03metro/It_is_a_financial_burden.html

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  2. agar yeh sahi hai to isma politicians aur babus na bahut paise banaya hai

    corruption

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  3. There is no doubt about the fact that the Delhi Metro is totally unsafe and unviable. More than Rs.35000 crores are being wasted in two phases of Delhi Metro to lay 185 kms. of Rail line. Spending only Rs.10000 crores on bus transport system of Delhi could have been much better than this Metro system. The Delhi Government should make an over bridge system and run Green and Red buses on these bridges. The recent Metro bridge collpses have also proved it unsafeness.

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  4. बड़े दुःख की बात है कि मीडिया ने हाल ही में दिल्ली मेट्रो के दुर्घटना के मामलों को उस जिम्मेदार ढंग से पेश नहीं किया जिस प्रकार उसे करना चाहिए था. मीडिया को ये मुद्दे जिम्मेदारी से उठाने चाहिए थे कि: 1. यदि मेट्रो के पुलों का यह हाल बिना ट्रेन चले है तो ट्रेन चलने के समय इन पुलों का क्या हाल होगा? 2. यदि गैमन एक ठेकेदार के तौर पर जिम्मेदार है तो भी दिल्ली मेट्रो की तरफ से 4500 अधिकारियों/ कर्मियों की फौज में से कौन लोग इन हादसों के लिए जिम्मेदार हैं? 3. इस मामले की जाँच में अपने ही मुख्य अभियंता {डिजाईन} को क्यों शामिल किया गया जबकि यह मामला प्रथम दृष्टया ही गलत डिजाईन का लगता है, मतलब इसका डिजाईन उसी मुख्य अभियंता ने स्वयं ही पास किया होगा. 4. जैसा कि दिल्ली नगर निगम के मेयर ने भी मुद्दा उठाया था कि इस मामले की जाँच में विभिन्न विभागों के अफसरों को शामिल किया जाना चाहिए ताकि दूध का दूध व पानी का पानी हो सके? 5. दिल्ली आईआईटी व डीसीई के प्रोफेसर पहले ही दिल्ली मेट्रो के ठेकेदारों के कार्यों के डिजाईन/ टेस्टिंग आदि में लिप्त रहते हैं व अब तो दिल्ली मेट्रो आईआईटी से अपने अधिकारियों को कोर्स भी करा रही है, तो क्या ये प्रोफेसर निष्पक्ष जाँच कर पायेंगे? 6. जानकारी के मुताबिक मेट्रो के छोटे से छोटे कामों पर भी काफी मेट्रो इंजिनियर तैनात रहते हैं तो उन पर अभी तक तुंरत कार्रवाई क्यों नहीं की गयी? क्या उन्हें लक्ष्मी नगर काण्ड की तरह ही बचाया जा रहा है? 7. पिछले काण्ड के लिए जिम्मेदार कंपनी अफ्कोंस पर कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की गयी. क्या एक नाटक नहीं किया गया कि उस कंपनी को एक साल के लिए कालीसूची में दाल दिया गया जबकि इस एक साल में कोई भी बड़ा ठेका दिया ही नहीं जाने वाला था?
    मेरी मीडिया से अपील है कि दिल्ली मेट्रो की कार्यप्रणाली जो कि संदेहास्पद प्रतीत हो रही है की जांच कराने के लिए सरकार पर दवाब बनाये. लेकिन शायद मीडिया को भी मेट्रो ने प्रसन्न किया हुआ है. शायद इसीलिए कोई भी अख़बार या चैनल आदि मेट्रो की बुराई की खबर बड़ा छुपाकर अलग से देता है जोकि आसानी से मिल भी न पाए. जिस लोकतंत्र का मीडिया भी अगर सही न दिखाए या छापे तो इस लोकतंत्र का भगवान ही मालिक है. एक बात जो इन हादसों और कैग की रपट से स्पष्ट होती है कि मेट्रो का काम बड़े ही लापरवाह ढंग से हो रहा है जो निश्चय ही खतरनाक है. एक बात जो विचार करने योग्य है कि अगर इस प्रकार के हादसे ट्रेन चलते समय हुए तो क्या होगा? मीडिया यह जानने का प्रयास क्यों नहीं करता कि मेट्रो को इतनी अधिक संख्या में कर्मचारी क्यों छोड़ रहे हैं? आखिर इस विभाग में ऐसी क्या खामियां हैं?
    यह एकदम गलत तथ्य है कि इस हादसे के लिए केवल ठेकेदार गैमन इंडिया ही दोषी है क्योंकि ठेकेदार जो भी डिजाईन या कार्य करता है उसे दिल्ली मेट्रो के इंजिनियर भी जांचते हैं. ऐसा नहीं है कि मेट्रो ने इंजिनियर न लगाये हों. तो फिर ऐसा क्या कारण था कि इन अधिकारियों ने न तो डिजाईन जांचा न ही काम. क्या यह एक प्रकार की मिलीभगत नहीं थी? मीडिया को स्वयं पहल करते हुए सरकार पर दवाब बनाना चाहिए कि इस मामले व मेट्रो की कार्यप्रणाली की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए क्योंकि यह हादसा इस ओर इशारा करता है कि मेट्रो के बिना गुणवत्ता के किये जा रहे कार्य से मेट्रो अधिकारी इतने बेफिक्र हैं कि उन पर इस बात तक का प्रभाव नहीं पड़ा कि इस पिलर नंबर 67 में पहले से ही दरार थी. सोचिये कि न जाने कितने पिलर और पुल ऐसे ही बेफिक्री से बना दिए गए होंगे या बनाये जा रहे होंगे. दिल्ली की मुख्यमंत्री को इस रपट का संज्ञान लेते हुए दिल्ली मेट्रो से पूछना चाहिए कि आखिर कोई मेट्रो का अपना अधिकारी इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार क्यों नहीं हैं? रहा सवाल एक निदेशक को वापस रेलवे भेजने का, तो वैधानिक दृष्टि से इस निदेशक के करिअर पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. वह कोई नौकरी से थोडा ही निकला गया, वह तो मात्र वापस भेजा गया है. आइये मीडिया व हम सब मिलकर इस मामले को अंत तक पहुंचाएं क्योंकि कल को हमारे ही बच्चों व हमें इस मेट्रो में सफ़र करना है.

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